दुर्वासा ऋषि का चतुर्थी विभक्ति प्रयोग
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दुर्वासा महाक्रोधी तापसः आसीत् ।
सः महर्षेः कण्वस्य आश्रमम् अगच्छत् ।
तत्र शकुन्तला ध्यानमग्ना आसीत् ।
दुर्वासा, "देवि, तापसाय भिक्षां देहि" इति याचनाम् अकरोत् ।
शकुन्तला तां न अशृणोत् ।
दुर्वासा भिक्षायै स्पृहयति स्म ।
अतः सः शकुन्तलायै अक्रुध्यत् ।
सः तस्यै शापमपि अयच्छत् ।
क्रोधः मनसः विकारः अस्ति ।
असूया अपि मनसः विकारः अस्ति ।
ये परेषां सम्पदां न सहन्ते ते परेभ्यः असूयति ।
धिक् तान् असूयाग्रस्तान् ।
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नियमः--
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(१.) "क्रुधद्रुहेर्ष्यासूयार्थानां यं प्रति कोपः" (१.४.३७)
जिस पर क्रोध किया जाये, उसमें चतुर्थी विभक्ति होती है । क्रोध के पर्याय से भी चतुर्थी हो जाती है । क्रुध्, द्रुह्, ईर्ष्या, आसूय् के योग में चतुर्थी होती है । जैसे---"अतः सः शकुन्तलायै अक्रुध्यत् ।"
(२.) जिस पर स्पृहा (चाहत) हो, उसमें भी चतुर्थी होती है---"स्पृहेरीप्सितः" (१.४.३६)
स्पृह् के योग में चतुर्थी होती है । जैसे---"दुर्वासा भिक्षायै स्पृहयति स्म ।"
(३.) "कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम्" (१.४.३२) कर्म के द्वारा जिसे सबसे अधिका चाहा जाए, उसमें सम्प्रदान होता है । जैसे---"देवि, तापसाय भिक्षां देहि"
(४.) सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति होती है---"चतुर्थी सम्प्रदाने" (२.३.१३)
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