शुक्रवार, 9 जून 2017

दुर्वासा ऋषि के साथ चतुर्थी विभक्ति


दुर्वासा ऋषि का चतुर्थी विभक्ति प्रयोग
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दुर्वासा महाक्रोधी तापसः आसीत् ।

सः महर्षेः कण्वस्य आश्रमम् अगच्छत् ।

तत्र शकुन्तला ध्यानमग्ना आसीत् ।

दुर्वासा, "देवि, तापसाय भिक्षां देहि" इति याचनाम् अकरोत् ।

शकुन्तला तां न अशृणोत् ।

दुर्वासा भिक्षायै स्पृहयति स्म ।

अतः सः शकुन्तलायै अक्रुध्यत् ।

सः तस्यै शापमपि अयच्छत् ।

क्रोधः मनसः विकारः अस्ति ।

असूया अपि मनसः विकारः अस्ति ।

ये परेषां सम्पदां न सहन्ते ते परेभ्यः असूयति ।

धिक् तान् असूयाग्रस्तान् ।
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नियमः--
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(१.) "क्रुधद्रुहेर्ष्यासूयार्थानां यं प्रति कोपः" (१.४.३७)

जिस पर क्रोध किया जाये, उसमें चतुर्थी विभक्ति होती है । क्रोध के पर्याय से भी चतुर्थी हो जाती है । क्रुध्, द्रुह्, ईर्ष्या, आसूय् के योग में चतुर्थी होती है । जैसे---"अतः सः शकुन्तलायै अक्रुध्यत् ।"

(२.) जिस पर स्पृहा (चाहत) हो, उसमें भी चतुर्थी होती है---"स्पृहेरीप्सितः" (१.४.३६)

स्पृह् के योग में चतुर्थी होती है । जैसे---"दुर्वासा भिक्षायै स्पृहयति स्म ।"

(३.) "कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम्" (१.४.३२) कर्म के द्वारा जिसे सबसे अधिका चाहा जाए, उसमें सम्प्रदान होता है । जैसे---"देवि, तापसाय भिक्षां देहि"

(४.) सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति होती है---"चतुर्थी सम्प्रदाने" (२.३.१३)
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