शनिवार, 1 अगस्त 2020

नारी-महिमा

=====================
www.vaidiksanskrit.com

लेखक :--- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

अस्माकं भारतवर्षे नारी समाजस्य स्थानम् अति महत्त्वपूर्णं वर्तते । ऐतरेयोपनिषदि "सा भावयित्री भावयितव्या भवति" अस्य मन्त्रस्य अयम् आशयः यत् नारी नरस्य गर्भे अपि भावयित्री पुरुषस्य एकः अहं बहुस्याम् इति इमाम् इच्छाम् अनुकूलयन्ती भावयन्ती च गर्भस्थं पुमांसं भावयति पोषयति पालयति अत एव सा मातृशक्तिकूपा पूजनीया च भवति ।


भारतीय-इतिवृत्ते यदा यदा पुरुषशक्तिः पराजिता भवति, तदा मातृशक्तिः सुसंघटिता मानवसमाजं विपद्भ्यः रक्षोगणेभ्यः रक्षति । अस्य उदाहरणं मार्कण्डेय पुराणे प्राप्यते । यदा महिषासुरनामधेयेन असुरेण सर्वे देनाः सुसमृद्धा मानवाश्च पराजिताः तदैव मातृशक्तिः सुसंघिटा ससैन्यं महिषासुरं महारणे हत्वा समाजं सुव्यवस्थितं प्रत्यस्थापयत् ।। लेखक :--- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

कलियुगे अपि महाराज्ञी लक्ष्मीबाई उद्दण्ड-गुरुण्ड-गजगण्डस्थलानि रणमण्डले स्वकीयेन विकरालेन करवालेन भिन्दन्ती शत्रून् पराजित्य वीरगतिं प्राप्य अद्यापि सर्वगं शास्ति । तस्याः चरितेन चास्माकं मनोबलं वर्धते । लेखक :--- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

जीजाबाई. अहिल्याबाई इति द्वे बहुश्रुते वीरांगने बभूवतुः इति को न जानाति । तयोः गुरुगौरवेण अस्माकं शिरांसि उन्नतिं भजन्ते । इतः कस्य वा सचेतसः चेतः अपरिचितम् अस्ति यत् स्वाधीनता संग्रामे जलियाँवाला इति आख्य-उद्याने रमणीयाम् अपि उपवनश्रियं भीषणतां नयन्त्यः चण्डिका इव प्रचण्डशौर्येण अहमहमिकया नरपिशाचानां गौरांगानाम् आग्नेय-अस्त्राणि अपि वीरगतिं गच्छन्त्यः स्वरुधिरवर्षया अशमयन् । यासां यशोराशिः आचन्द्रतारकं निखिलम् अचलामण्डलं प्रकाशयिष्यति । लेखक :--- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

याः स्वातन्त्र्यरणे युद्धवीरान् पुरुषान् अपि पृष्ठतः कृत्वा गौरांगशासकान् चेतांसि विस्मायपयन्त्यः स्वातन्त्र्यरणस्य भीषणताम् असह्यताम् च प्रादर्शयन् । तासामेव महामहनीय-महिलानां त्यागेन अद्य वयं स्वतन्त्रतां भजामः । कथनस्य अयम् आशयः यत् स्वतन्त्रता-संग्रामे सम्माननीय-महिलानां सहयोगेन एव वयं स्वतन्त्राः अभवाम । स्वतन्त्रतायां च सम्प्राप्तायां शासनसंचालने अपि मातृशक्तिः महत्त्वपूर्णं स्थानं पश्यामः ।  लेखक :--- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

यथा विजयलक्ष्मीपण्डिता कूटनीतेः आदर्शम् अस्माकं पुरस्तात् अस्थापयत् । एवमेव अरुणा आसफ अलि महाभागा अपि समाजवादि-शासनपद्धतिम् आजीवनं भारतीयान् अशिक्षयत् । एवमेव सुचेता कृपलानी महाभागा अपि प्रशासन-व्यवस्थायां स्वकीयम् अप्रतिमं पाण्डित्यं प्रादर्शयत् । एवमेव सत्याम् अपि राजनैतिक-प्रतिद्वन्द्वितायां भारतीय-प्रधानमन्त्रि पदमलंकुवाणा देशस्य सर्वांगीण समुन्नतये स्वकीयं जीवनं समर्पयन्ती प्रियदर्शिनी इन्दिरागन्धिमहोदया पोकरणे पारमाण्विकं विस्फोटं कृत्वा भारतम् अपि परमाणुशक्ति-सम्पन्नम् अघोषयत् । महाशक्त्यः अपि विरोधं कर्तुम् नैव अशक्नुवन् ।

सिक्किमदेशम् अपि प्रेम्णा राजनैतिकदूरदृष्ट्य भारतसंघराज्ये अमेलयत् । पाकिस्तानं च भारतेन सह अकारण-शत्रुतां कुर्वन्तं अमेरिकाबलं प्राप्य युद्धोन्मादग्रस्तं क्रीडया एव पराजित्य द्विधा अभिन्दत् यतः बंगलादेश-आख्यराष्ट्रं नूतनम् एव समुदितम् । अधुना अपि प्रान्तीय शासनेषु केन्द्रीय-शासने च बह्व्यः नार्यः भारतीय-शासन-आकाशे देदीप्यमान-नक्षत्राणि इव शासनं संचालयन्ति । सुषमा स्वराज महाभागा अपि अस्य़ उदाहरणं वर्तते । लेखक :--- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

अस्य देशस्य सर्वांगीणविकासे समभागिन्यः महिलाः अधुना अपि सर्वथा सम्माननीयाः राष्ट्रनिर्माणे सर्वेषु क्षेत्रेषु तासाम् अपि सहयोगी ग्रहीतव्यः । देशस्य सर्वांगीणविकासे ताः कथम् अपि नोपेक्षणीयाः । नरनार्योः जीवने समानं स्थानम् अस्ति । इति अयं सिद्धान्तः अक्षरशः अनुपालनीयः अस्माभिः ।

===============================
www.facebook.com/girvanvani
http://laukiksanskrit.blogspot.in/

सोमवार, 15 जून 2020

संस्कृत भाषा की विशेषता



संस्कृत भाषा से अपनी बीमारी को ठीक करे
===============================

⭕संस्कॄत का जादू⭕
==============

संस्कृत में निम्नलिखित विशेषताएँ हैं, जो उसे अन्य सभी भाषाओं से उत्कृष्ट और विशिष्ट बनाती हैं।

(१.) अनुस्वार  (अं ) और २.) विसर्ग (अ:) :-

संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण और लाभदायक व्यवस्था है :---- अनुस्वार और विसर्ग ।

पुल्लिंग के अधिकांश शब्द विसर्गान्त होते हैं :---

यथा- राम:,  बालक:, हरि:, भानु:, आदि ।

नपुंसकलिंग के अधिकांश शब्द व्यञ्जनान्त होते हैं—

यथा- जलम्,  वनम्,  फलम् पुष्पम् आदि ।
यह शब्दों के अंत में स्थित "म्" अनुस्वार के स्थान पर ही आते हैं ।

अब जरा ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि विसर्ग का उच्चारण और कपालभाति प्राणायाम दोनों में श्वास को बाहर फेंका जाता है, अर्थात् जितनी बार विसर्ग का उच्चारण करेंगे, उतनी बार कपालभाति प्राणायाम अनायास ही हो जाता है । जो लाभ कपालभाति प्राणायाम से होते हैं, वे केवल संस्कृत के विसर्ग उच्चारण से प्राप्त हो जाते हैं।

उसी प्रकार अनुस्वार का उच्चारण और भ्रामरी प्राणायाम एक ही क्रिया है । भ्रामरी प्राणायाम में श्वास को नासिका के द्वारा छोड़ते हुए भौंरे की तरह गुञ्जन करना होता है और अनुस्वार के उच्चारण में भी यही क्रिया होती है। अत: जितनी बार अनुस्वार का उच्चारण होगा , उतनी बार भ्रामरी प्राणायाम स्वत: हो जायेगा।

कपालभाति और भ्रामरी प्राणायामों से क्या लाभ है? यह बताने की आवश्यकता नहीं है, किंतु फिर भी मैं आप सब को बताना चाहता हूं कि कपालभाति से पेट की चर्बी दूर होती है । पैंक्रियास ठीक होता है । कब्ज में लाभ होता है । पेट की सारी बीमारियां दूर हो जाती हैं । रेस्पिरेटरी सिस्टम ठीक होता है । यह प्राणायाम सभी श्वास रोगों में लाभदायक है । मोटापे में लाभदायक है । इसी प्रकार भ्रामरी प्राणायाम से मन को शांति मिलती है । मन एकाग्र चित्त होता है । बुद्धि का विकास होता है । पूजा पाठ में मन लग जाता है, इत्यादि । मैं तो केवल यह बताना चाहता हूँ कि संस्कृत बोलने मात्र से उक्त प्राणायाम अपने आप होते रहते हैं।

जैसे हिन्दी का एक वाक्य लें- '' राम फल खाता है``

इसको संस्कृत में बोला जायेगा- '' राम: फलं खादति"

राम फल खाता है ,यह कहने से काम तो चल जायेगा, किन्तु "राम: फलं खादति"  कहने से अनुस्वार और विसर्ग रूपी दो प्राणायाम हो रहे हैं। यही संस्कृत भाषा का रहस्य है।

संस्कृत भाषा में एक भी वाक्य ऐसा नहीं होता, जिसमें अनुस्वार और विसर्ग न हों। अत: कहा जा सकता है कि संस्कृत बोलना अर्थात् चलते फिरते योग साधना करना।

२- शब्द-रूप :-

संस्कृत की दूसरी विशेषता है शब्द रूप। विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक ही रूप होता है, जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के २४ रूप होते हैं। जैसे राम शब्द के निम्नानुसार २४ रूप बनते हैं।

यथा:- राम (मूल शब्द)
----------------------------
एकवचन         द्विवचन          बहुवचन
राम:                  रामौ               रामा:
रामम्                 रामौ              रामान्
रामेण               रामाभ्याम्         रामै:
रामाय               रामाभ्याम्        रामेभ्य:
रामात्              रामाभ्याम्         रामेभ्य:
रामस्य              रामयो:            रामाणाम्
रामे                  रामयो:             रामेषु
हे राम !             हे रामौ !             हे रामा: !

इस शब्द रूप में तीन वचन, आठ विभक्तियां ६ कारक हैं । यदि ८ को ३ से गुणा कर दिया जाए तो कुल २४ शब्द बनते हैं । एक मूल शब्द को मिला दिया जाए तो कुल २५ शब्द हो जाते हैं । ये २५ रूप सांख्य दर्शन के २५ तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिस प्रकार पच्चीस तत्वों के ज्ञान से समस्त सृष्टि का ज्ञान प्राप्त हो जाता है, वैसे ही संस्कृत के पच्चीस रूपों का प्रयोग करने से आत्म साक्षात्कार हो जाता है और इन २५ तत्वों की शक्तियाँ संस्कृतज्ञ को प्राप्त होने लगती है।

सांख्य दर्शन के २५ तत्व निम्नानुसार हैं।-

आत्मा (पुरुष)

चार अंत:करण :---- मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार ।

पॉच ज्ञानेन्द्रियाँ :---नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कर्ण ।

पाॉच कर्मेन्द्रियाँ :---- पाद हस्त उपस्थ पायु वाक् ।

पाॅच तन्मात्रायें :----- गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द ।

पाॅच महाभूत :---- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश ।

३- द्विवचन :-

संस्कृत भाषा की तीसरी विशेषता है द्विवचन। हिन्दी, अंग्रेजी आदि भाषाओं में केवल एकवचन और बहुवचन ही होते हैं, जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। इस द्विवचन पर ध्यान दें तो पायेंगे कि यह द्विवचन बहुत ही उपयोगी और लाभप्रद है।

जैसे :- राम शब्द के द्विवचन में निम्न रूप बनते हैं:- रामौ , रामाभ्याम् और रामयो:।

 इन तीनों शब्दों के उच्चारण करने से योग के क्रमश: मूलबन्ध ,उड्डियान बन्ध और जालन्धर बन्ध लगते हैं, जो योग की बहुत ही महत्वपूर्ण क्रियायें हैं।

४ सन्धि :-

संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि। ये संस्कृत में जब दो शब्द पास में आते हैं तो वहाँ सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। उस बदले हुए उच्चारण में जिह्वा आदि को कुछ विशेष प्रयत्न करना पड़ता है।ऐसे सभी प्रयत्न एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति के प्रयोग हैं।

'इति अहं जानामि" इस वाक्य को चार प्रकार से बोला जा सकता है, और हर प्रकार के उच्चारण में वाक् इन्द्रिय को विशेष प्रयत्न करना होता है।

यथा:-
१ इत्यहं जानामि।
२ अहमिति जानामि।
३ जानाम्यहमिति ।
४ जानामीत्यहम्।

इन सभी उच्चारणों में विशेष आभ्यन्तर प्रयत्न होने से एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति का सीधा प्रयोग अनायास ही हो जाता है। जिसके फलस्वरूप मन और बुद्धि सहित समस्त शरीर पूर्ण स्वस्थ एवं नीरोग हो जाता है।

इन समस्त तथ्यों से सिद्ध होता है कि संस्कृत भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान की भाषा ही नहीं ,अपितु मनुष्य के सम्पूर्ण विकास की कुंजी है।

 यह वह भाषा है, जिसके उच्चारण करने मात्र से व्यक्ति का कल्याण होता है।

 इसीलिए इसे देवभाषा, देववाणी, गीर्वाणवाणी और अमृतवाणी कहते हैं।